उत्तराखंड में सात साल में नहीं लगे ढाई करोड़ पौधे

देहरादून, [केदार दत्त]: क्षतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं नियोजन प्राधिकरण यानी कैंपा से मिलने वाली निधि को लेकर भले ही राज्य और केंद्र में ठनी हो, लेकिन ये भी सच है कि इसके लिए राज्य ही अधिक जिम्मेदार हैं। कम से कम उत्तराखंड का सूरतेहाल तो यही बयां कर रहा है। क्षतिपूरक पौधरोपण (विकास कार्य
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उत्तराखंड में सात साल में नहीं लगे ढाई करोड़ पौधे

देहरादून, [केदार दत्त]: क्षतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं नियोजन प्राधिकरण यानी कैंपा से मिलने वाली निधि को लेकर भले ही राज्य और केंद्र में ठनी हो, लेकिन ये भी सच है कि इसके लिए राज्य ही अधिक जिम्मेदार हैं। कम से कम उत्तराखंड का सूरतेहाल तो यही बयां कर रहा है।

क्षतिपूरक पौधरोपण (विकास कार्य अथवा आपदा से नष्ट हुए वृक्षों की एवज में लगने वाले पौधे) को ही लें तो कैंपा के तहत यह मूल कार्य है, लेकिन इसका बैकलॉग लगातार बढ़ रहा है और सात साल में यह 12 हजार हेक्टेयर पहुंच गया है। क्षतिपूरक पौधरोपण में नियमानुसार प्रति हेक्टेयर दो हजार पौधे लगते हैं। इस लिहाज से देखें तो 2.40 करोड़ पौधे तब से अब तक नहीं लग पाए हैं। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण के सिस्टम की कार्यशैली पर भी सवाल उठने लाजिमी हैं।
थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो 2011 से तदर्थ रूप से चल रही कैंपा योजना में 70 फीसद कार्य वन क्षेत्र में क्षतिपूरक वनीकरण और शेष 30 फीसद में दूसरे कार्य होते आए हैं। केंद्र की गाइडलाइन के अनुसार इन कार्यों की स्वीकृति प्रदेश के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति देती आई है।
इसी का फायदा उठाते हुए उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों ने कैंपा के बजट से क्षतिपूरक वनीकरण की बजाए दूसरे कार्यों के लिए ज्यादा बजट खपाना शुरू कर दिया। पिछले वर्ष तीन अगस्त को कैंपा को केंद्र सरकार ने एक्ट में अधिसूचित कर दिया। साथ ही इसमें प्रावधान किया कि राज्य सरकारें अब सिर्फ प्रस्ताव भेजेंगी और अनुमोदन केंद्र सरकार करेगी। यही नहीं, केंद्र को हक होगा कि वह किसी भी कार्ययोजना में बदलाव भी कर सकती है।
ये प्रावधान राज्यों को नागवार गुजर रहे हैं। हालांकि, केंद्र को एक्ट बनाकर इसमें कड़े प्रावधान करने पड़े तो इसके लिए राज्य ही जिम्मेदार हैं, जो अपने हिसाब से कैंपा के बजट को दबाव बनाते आए है। उत्तराखंड का सूरतेहाल भी ऐसा ही है। 71 फीसद वन भूभाग वाले इस सूबे में भी कैंपा के तहत होने वाला प्लांटेशन का मुख्य कार्य काफी पीछे छूट गया और वन मार्गों का निर्माण, सुरक्षा दीवार समेत अन्य सिविल कार्य खासे बढ़ गए।
और तो और कैंपा मद से फसल क्षति तक का मुआवजा भी दिया जाने लगा।  इस सबके चलते सूबा पौधरोपण में लगातार पिछड़ रहा है। आंकड़े इसे तस्दीक कर रहे हैं। वर्ष 2014-15 में वन विभाग ने 14 हजार हेक्टेयर में पौधरोपण किया, जो 2016-17 में सिमटकर छह हजार हेक्टेयर पर आ गया।
 ऐसे में क्षतिपूरक पौधरोपण का बैकलॉग लगातार बढ़ता चला गया। अपर प्रमुख मुख्य वन संरक्षक एवं उत्तराखंड कैंपा के मुख्य कार्याधिकारी समीर सिन्हा के मुताबिक पिछले सात साल में क्षतिपूरक पौधरोपण का बैकलॉग 12 हजार हेक्टेयर पहुंच गया है। अब इसके लिए ठोस कार्ययोजना तैयार की गई है।