स्वर्गारोहिणी से युधिष्ठिर गए थे स्वर्ग, अब पर्यटकों का रोमांच

चमोली : बदरीनाथ धाम की तरह ही सतोपंथ-स्वर्गारोहिणी यात्रा के भी पुराने दिन लौट आए हैं। छह मई को बदरीनाथ के कपाट खुलने के बाद अब तक ढाई हजार से अधिक पर्यटक स्वर्गारोहिणी की यात्रा कर चुके हैं। समुद्रतल से 15000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित स्वर्गारोहिणी-सतोपंथ जाने के लिए मई से अक्टूबर
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चमोली : बदरीनाथ धाम की तरह ही सतोपंथ-स्वर्गारोहिणी यात्रा के भी पुराने दिन लौट आए हैं। छह मई को बदरीनाथ के कपाट खुलने के बाद अब तक ढाई हजार से अधिक पर्यटक स्वर्गारोहिणी की यात्रा कर चुके हैं। समुद्रतल से 15000 फीट से अधिक की ऊंचाई पर स्थित स्वर्गारोहिणी-सतोपंथ जाने के लिए मई से अक्टूबर तक का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है।

वर्ष 2013 की आपदा के बाद बदरीनाथ जाने वाले यात्रियों की संख्या में कमी आ गई थी। वर्ष 2015 में केवल 40 पर्यटकों ने स्वर्गारोहणी की यात्रा की, लेकिन 2016 में यह संख्या 600 तक पहुंची। इस वर्ष तो यात्रियों की संख्या में करीब चार गुना इजाफा हुआ। इसी के साथ स्वर्गारोहिणी की यात्रा पर लगा आपदा का ग्रहण भी छंटता नजर आने लगा।

इस यात्रा को सबसे दुर्गम माना गया है। बदरीनाथ से 28 किमी की यह पैदल यात्रा निर्जन पड़ावों से होकर गुजरती है। बदरीनाथ के पास सीमा के अंतिम गांव माणा तक तीन किमी की दूरी वाहन से तय की जा सकती है। शेष 25 किलोमीटर पैदल ही चलना पड़ता है। पर्यटक एवं यात्रियों को अपने साथ ही टेंट व खाने का सामान भी ले जाना पड़ता है। यात्रा चार रात व पांच दिन की है।

स्वर्गारोहिणी स्प्रिचुअल एडवेंचर कंपनी बदरीनाथ के प्रबंधक राहुल मेहता बताते हैं कि इस बार जिस तरह बदरीनाथ धाम में यात्रियों की भीड़ उमड़ रही है, उससे स्वर्गारोहिणी जाने में भी यात्री दिलचस्पी दिखा रहे हैं। उनके व अन्य टूर संचालकों के पास अक्टूबर तक की अग्रिम बुकिंग आ चुकी है।

धार्मिक महत्ता

मान्यता है कि स्वर्गारोहिणी से धर्मराज युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग गए थे। स्वर्गारोहिणी के रास्ते में अन्य पांडवों ने धर्मराज का साथ छोड़ दिया था। उनके साथ अंत तक श्वान के रूप में धर्मराज रास्ता दिखाने का काम करते रहे।

ऐसे होती है यात्रा

माणा में सरस्वती नदी पर भीमपुल से शुरू होने वाली इस यात्रा का पहला पड़ाव नौ किमी की दूरी पर लक्ष्मी वन है। मान्यता है कि भगवान नारायण की तपस्या के दौरान बदरी (बेर का वृक्ष) बनकर छांव करने पर लक्ष्मी को इस वन में ही निवास करने का वरदान मिला था। लक्ष्मी वन के बाद दस किमी यात्रा करने पर चक्रतीर्थ पड़ता है।

यहां पहुंचने से पहले सहस्रधारा भी मिलती है। पहाड़ से गिर सौ से अधिक धाराएं यात्रियों का मन मोह लेती हैं। यह यात्रा का दूसरा पड़ाव है। यहां पर मखमली बुग्याल के साथ हिमाच्छादित पर्वत शृंखलाओं के बीच रहने का आनंद ही कुछ और है। आठ किमी की दूरी पर अंतिम पड़ाव सतोपंथ झील है। सतोपंथ से ही अलकनंदा का उदगम होता है। यह स्वर्गारोहिणी का बेस कैंप भी है।

यह है जरूरी

यात्रियों को उच्च हिमालयी क्षेत्र में जाने के लिए स्वास्थ्य की जांच के साथ ही नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क से अनुमति लेनी पड़ती है। अगर पर्यटक या यात्री स्थानीय टूर पैकेज से यात्रा करता है तो लगभग 12000 रुपये के भुगतान पर प्रति यात्री यात्रा कराई जाती है। इस शुल्क में रहने-खाने, पोर्टर, अनुमति, गाइड सहित सभी सुविधाएं शामिल हैं। यात्री को अनिवार्य रूप से प्लास्टिक व अन्य कचरा वापस लाना होता है।