देहरादून,। देवभूमि देहरादून में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित सात दिवसीय दिव्य श्रीराम कथा का सप्तम एवं अंतिम दिवस एक ऐसे आध्यात्मिक निष्कर्ष के रूप में प्रकट हुआ, जहाँ कथा अपने चरम पर पहुँचकर मानव जीवन, चेतना, त्याग, नारी शक्ति, धर्म और रामराज्य के शाश्वत दर्शन को एक सूत्र में पिरोती दिखाई दी। कथा में अतिथि के रूप में खजान दास (विधायक राजपुर रोड़), चंद्रमोहन पाण्डेय (तकनीकी सलाहकार लोक निर्माण विभाग, उत्तराखंड शासन), डॉ० अभिषेक जैन (सर्जन अरिहंत अस्पताल) जी के द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया। दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी के दिव्य मार्गदर्शन में कथा व्यास साध्वी दीपिका भारती जी ने अंतिम दिवस के प्रसंगों को इस प्रकार उद्घाटित किया कि श्रोताओं के भीतर रामायण एक जीवंत अनुभूति बनकर प्रवाहित होने लगी।
कथा का प्रवाह माता सीता की अग्निपरीक्षा के अत्यंत गूढ़ प्रसंग की ओर बढ़ा। वर्षों से चर्चा और विवाद का विषय बने इस प्रसंग को कथा व्यास जी ने अत्यंत सूक्ष्म आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से समझाया। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में चेतना, ऊर्जा, तत्वों और सृष्टि के नियमों को लेकर जो ज्ञान परंपरा थी, वह आज भी आधुनिक मानव के लिए आश्चर्य का विषय है। ऋषि-मुनियों ने जिन सत्यों को साधना और आत्मानुभूति के स्तर पर जाना था, रामायण उन्हीं गहन आयामों को कथा के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। अग्निपरीक्षा का रहस्य भी इसी चेतना विज्ञान से जुड़ा हुआ है, जहाँ मानव अस्तित्व को केवल स्थूल शरीर तक सीमित नहीं माना गया। कथा के इसी प्रवाह में आधुनिक समाज और स्त्री चेतना का प्रश्न अत्यंत मार्मिक रूप से उभरकर सामने आया। कथा व्यास जी ने कहा कि आज की स्त्री शिक्षित है, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है, निर्णय लेने में सक्षम है, समाज में नेतृत्व कर रही है, फिर भी उसके भीतर भय, असुरक्षा, मानसिक दबाव और भावनात्मक संघर्ष क्यों बने हुए हैं? सभ्यता ने सुविधाएँ तो बढ़ाई, किंतु भीतर की स्थिरता और आत्मबल का पोषण कहीं पीछे छूट गया। बाहरी उपलब्धियों के मध्य भी आधुनिक स्त्री एक गहरे भावनात्मक और आध्यात्मिक रिक्तता से गुजरती दिखाई देती है।
इसी संदर्भ में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की महिला सशक्तिकरण पहल ैंदजनसंद का उल्लेख हुआ, जिसके माध्यम से नारी चेतना को उसके मूल स्वरूप से पुनः जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। कथा में यह भाव अत्यंत सुंदर ढंग से उभरा कि सनातन संस्कृति ने नारी को कभी दया या संरक्षण का विषय नहीं माना; उसे शक्ति, सृजन और संतुलन की धुरी के रूप में प्रतिष्ठित किया। दिव्य गुरु आशुतोष महाराज द्वारा प्रतिपादित अवधारणा इसी जागृत नारी चेतना का आह्वान करती है ऐसी नारी जो आधुनिक भी हो, आत्मबोध से संपन्न भी; संवेदनशील भी हो और भीतर से आध्यात्मिक रूप से सशक्त भी।
माता सीता के जीवन को इसी चेतना के रूप में प्रस्तुत करते हुए कथा व्यास जी ने कहा कि वे केवल त्याग और धैर्य की प्रतिमूर्ति नहीं थीं। उनके व्यक्तित्व में करुणा थी, किंतु उसी के साथ अद्भुत आंतरिक शक्ति भी थी; उनमें कोमलता थी, किंतु चेतना इतनी जागृत थी कि विपरीत परिस्थितियाँ भी उन्हें तोड़ नहीं सकीं। उनका जीवन इस सत्य का प्रतीक बनकर उभरा कि वास्तविक सशक्तिकरण बाहरी विद्रोह से नहीं, बल्कि भीतर की जागृत स्थिरता, आत्मबोध और आध्यात्मिक शक्ति से जन्म लेता है। भक्ति, दर्शन, चेतना और आत्ममंथन से परिपूर्ण इस सात दिवसीय श्रीराम कथा ने श्रोताओं के अंतर्मन में यह अनुभूति पुनः जागृत कर दी कि रामराज्य कोई बीता हुआ स्वर्णिम इतिहास नहीं, बल्कि प्रत्येक जागृत चेतना के भीतर पुनः स्थापित होने वाली संभावना है। संस्थान की आध्यात्मिक एवं सामाजिक पहलों के बारे में अधिक जानकारी हेतु दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की वेबसाइट ूूू.कररे.वतह पर विजिट किया जा सकता है।

