रुद्रप्रयाग,। जनपद में रिवर ड्रेजिंग के नाम पर नदियों का बेरहमी से दोहन किया जा रहा है। सरकारी मानकों के अनुसार नदी तल से अधिकतम 1.5 मीटर तक ही मलबा हटाने की अनुमति है, ताकि नदी का प्राकृतिक संतुलन और पर्यावरण सुरक्षित रहे। लेकिन जलई पट्टे में दिन-दहाड़े 6 मीटर तक गहरी खुदाई कर नियमों को खुली चुनौती दी जा रही है।
सूत्रों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि भारी मशीनों से की जा रही इस अंधाधुंध खुदाई ने नदी की संरचना को असंतुलित कर दिया है। सवाल यह है कि जब नियम स्पष्ट हैं तो इतनी गहराई तक खनन किसके संरक्षण में हो रहा है? उत्तराखंड की रिवर ड्रेजिंग नीति (2021 एवं संशोधन) में साफ प्रावधान है कि ड्रेजिंग का उद्देश्य नदी के प्रवाह को सुचारु करना और चैनलाइजेशन तक सीमित रखना है। अधिकतम गहराई की सीमा तय की गई है ताकि पर्यावरणीय संतुलन बना रहे। लेकिन जलई पट्टे में 6 मीटर तक खुदाई कर इन नियमों को दरकिनार किया जा रहा है। यह सिर्फ मानकों का उल्लंघन नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आपदा को न्योता देने जैसा है।
पर्यावरण विशेषज्ञ देवराघवेंद्र बद्री का मानना है कि इतनी गहरी खुदाई से नदी का प्राकृतिक प्रवाह असंतुलित हो सकता है। तटवर्ती क्षेत्रों में कटाव तेज हो सकता है। अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। भूजल स्तर गिर सकता है। पुलों और सड़कों की नींव कमजोर पड़ सकती है यदि यही स्थिति जारी रही तो मंदाकिनी सहित अन्य नदियों का इकोसिस्टम गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। अब देखना यह है कि प्रशासन सख्ती दिखाता है या नदियों का दोहन यूं ही चलता रहेगा।
खनन अधिकारी वीरेंद्र सिंह ने कहा कि जलई में तीन मीटर तक खनन की अनुमति है और शेष मामले में मौके पर जाकर जांच की जाएगी। हालांकि स्थानीय लोग इसे औपचारिक बयान मान रहे हैं और तत्काल सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
यदि अनुमति 1.5 या 3 मीटर तक है तो 6 मीटर खुदाई कैसे? क्या निरीक्षण सिर्फ कागजों में हो रहे हैं? अवैध खनन से होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा? स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से तत्काल संयुक्त निरीक्षण, अवैध खनन पर रोक, दोषियों पर मुकदमा और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।
बाढ़, कटाव और भूजल पर संकट
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