भारतीय ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और प्रदर्शनकारी कलाओं में निहित ज्ञान-चेतना को एक नए दृष्टिकोण से समझने और उसका उत्सव मनाने के उद्देश्य से सुरजीत अकादमी के तत्वावधान में तथा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से 30 सितंबर से 3 अक्टूबर तक गुवाहाटी में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक महोत्सव 2026 का सफल समापन हुआ।
“प्रदर्शनकारी कलाओं के दृष्टिकोण से भारतीय विद्या की खोज” विषय पर आधारित इस चार दिवसीय आयोजन में असम सहित देश के विभिन्न राज्यों से शोधकर्ताओं, कलाकारों, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं तथा विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने व्यापक रूप से भाग लिया। संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिभागियों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति ने आयोजन को एक विशेष आयाम प्रदान किया।
भारतीय ज्ञान-परंपरा केवल पुस्तकों, शास्त्रों अथवा लिखित ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकजीवन, संगीत, नृत्य, नाट्य, कठपुतली, कथा-वाचन, लोकाचार तथा विभिन्न पारंपरिक प्रदर्शनकारी कलाओं में भी यह ज्ञान-परंपरा गहराई से संरक्षित है—इसी मूल विचार को केंद्र में रखते हुए संगोष्ठी में विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि प्रदर्शनकारी कलाओं को केवल मनोरंजन के माध्यम के रूप में न देखकर ज्ञान के संरक्षण, शिक्षा, सांस्कृतिक पहचान, विरासत की निरंतरता तथा सामाजिक जुड़ाव के एक सशक्त माध्यम के रूप में देखने की आवश्यकता है।
30 सितंबर और 1 अक्टूबर को वेस्ट गुवाहाटी कॉलेज ऑफ एजुकेशन में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित विद्वानों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया। प्रथम दिन डॉ. मृणाल बोरा, पूर्व रजिस्ट्रार, महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव विश्वविद्यालय, असम, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर श्री छबिन राजखोवा, पूर्व सचिव, श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र; डॉ. मल्लिका कंडली, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित; तथा डॉ. अशिम बोरा, शोध अधिकारी, जनजातीय अनुसंधान संस्थान, असम सरकार, ने संसाधन व्यक्ति के रूप में भाग लिया।
दूसरे दिन की संगोष्ठी में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्री प्रभितांशु दास; कर्नाटक के मैसूर के प्रसिद्ध एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के संगीत कलाकार श्री सुमंथ मंजुनाथ; तथा संगीत नाटक अकादमी के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार से सम्मानित श्री हिमांशु शर्मा ने संसाधन व्यक्ति के रूप में भाग लिया।
संगोष्ठी में शोधकर्ताओं, शिक्षकों, कलाकारों, साहित्यकारों तथा विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने भारतीय विद्या और प्रदर्शनकारी कलाओं के विभिन्न आयामों पर एक जीवंत विचार-विनिमय का वातावरण तैयार किया।
2 अक्टूबर को श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र के डॉ. बाणीकांत काकती सभागार में आयोजित सांस्कृतिक संध्या में कठपुतली नाटक, वायलिन संगीत तथा नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित किया। कार्यक्रम में डॉ. अमलेंदु चक्रवर्ती, पूर्व कुलपति, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे तथा उन्होंने सांस्कृतिक संध्या का उद्घाटन किया।
त्रिपुरा पपेट थिएटर की ओर से संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रभितांशु दास के निर्देशन में “रानी लक्ष्मीबाई” नामक कठपुतली नाटक प्रस्तुत किया गया। इस कठपुतली नाटक में इतिहास, वीरता और देशभक्ति को प्रभावशाली ढंग से दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद कर्नाटक के मैसूर के प्रसिद्ध एवं अंतरराष्ट्रीय कलाकार श्री सुमंथ मंजुनाथ की वायलिन संगीत प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सांस्कृतिक संध्या की एक अन्य प्रमुख प्रस्तुति सुरजीत अकादमी का “स्वाधीनता की ज्योति” नाटक था। स्वतंत्रता सेनानी भोगेश्वरी फूकनानी के जीवन, साहस, देशभक्ति और बलिदान पर आधारित इस नाटक की पटकथा एवं निर्देशन सीमांत शर्मा ने किया। सहायक निर्देशक स्वपन दास, बिनिता देवी और हेमेन सेनापति थे।
नाटक में करिश्मिता तालुकदार, कृष्टि राजबोंगशी, ध्रुव ज्योति कलिता, पलक कोइरी, आरित्रीका बरुआ, जीत शाहा, तृष्णा कलिता, आरिया जिब्रान, लियाना देव, हार्दिक शर्मा, स्वपन दास और हेमेन सेनापति ने अभिनय किया।
3 अक्टूबर को उसी सभागार में आयोजित समापन समारोह में “बर धूलिया” की प्रस्तुति हुई। बर धूलिया दल, निज सिपाझार, तुआपारा, सिपाझार, असम द्वारा प्रस्तुत इस कार्यक्रम का निर्देशन भावेंद्र नाथ ने किया।
इसके बाद अभिनव थिएटर, लखीमपुर की ओर से दयाल कृष्ण नाथ के निर्देशन में “कड़वा सच” नाटक प्रस्तुत किया गया। नाटक में रवि रंजन कुमार, दक्षिणा नाथ, रवि वर्मा, मनोज कुमार, दयाल कृष्ण नाथ और करुणा कृष्ण नाथ ने अभिनय किया।
यह चार दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक महोत्सव भारतीय विद्या के बहुआयामी स्वरूप तथा प्रदर्शनकारी कलाओं के साथ उसके गहरे संबंध को एक साझा मंच पर प्रस्तुत करने में सफल रहा।
विशेष रूप से शोधकर्ताओं एवं शिक्षाविदों की विचारपूर्ण चर्चाओं, कलाकारों एवं साहित्यकारों की भागीदारी, विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय के विद्यार्थियों की सक्रिय उपस्थिति तथा विभिन्न पारंपरिक प्रदर्शनकारी कलाओं की प्रस्तुतियों ने इस आयोजन को एक बहुआयामी सांस्कृतिक एवं बौद्धिक मंच में परिवर्तित कर दिया।
भारतीय ज्ञान-परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना, पारंपरिक कलाओं का संरक्षण एवं प्रचार करना तथा कला और ज्ञान के बीच एक जीवंत संबंध स्थापित करना इस आयोजन के प्रमुख उद्देश्यों में से एक था।
सुरजीत अकादमी का यह प्रयास प्रदर्शनकारी कलाओं के माध्यम से भारतीय विद्या, विरासत और सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी के समक्ष एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं सार्थक पहल के रूप में विशेष महत्व रखता है।

