पिथौरागढ़,। सदियों पुराने भारत-चीन सीमा व्यापार का स्वरूप अब पूरी तरह बदलने जा रहा है। दुर्गम हिमालयी रास्तों पर सामान ढोने वाले घोड़ों और खच्चरों की टाप के स्थान पर अब आधुनिक वाहनों के हॉर्न गूंजेंगे। लिपुलेख दर्रे तक सड़क मार्ग के सुदृढ़ीकरण के बाद अब भारतीय व्यापारी धारचूला से सीधे वाहनों के माध्यम से तिब्बत सीमा तक अपना माल पहुंचा सकेंगे।
इस ऐतिहासिक बदलाव से व्यापार की गति में क्रांतिकारी सुधार आने की उम्मीद है। पहले जहां धारचूला से सामान लेकर व्यापारियों को पैदल और पशुओं के सहारे कई दिनों का सफर तय करना पड़ता था, वहीं अब व्यापारी महज 4 से 5 घंटे के भीतर भारतीय मंडी गुंजी पहुंच सकेंगे। सड़क मार्ग की पहुंच से न केवल समय की बचत होगी, बल्कि सामान ढुलाई में भी भारी कमी आएगी। पहले गुंजी पहुंचने के लिए तीन से चार पड़ाव करने पडते थे।व्यापारियों का कहना है कि लिपुलेख तक वाहनों की पहुंच से भारतीय व्यापारी पर्याप्त सामान लेकर जा सकेंगे। सीमांत क्षेत्र के विकास के साथ-साथ यह पहल अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों को नई ऊंचाई प्रदान करेगी। प्रशासन इस सत्र में व्यापार को और सुगम बनाने के लिए बुनियादी ढांचों के विस्तार पर जोर दे रहा है।तिब्बत पर चीन के आधिपत्य और भारत चीन युद्ध 1962 के बाद व्यापार बंद हो गया था। तीस वर्ष बाद 1992 से भारत चीन सीमांत स्थलीय व्यापार आरंभ हुआ । यह व्यापार उत्तरोत्तर बढ़ता रहा। वर्ष 2019 तक चलता रहा। 2020 में कोविड के चलते व्यापार बंद हो गया और इसी वर्ष भारत में सड़क का भी निर्माण हुआ । तब से व्यापार बंद होने से भारतीय व्यापारी सड़क मार्ग से व्यापार से वंचित हैं । इस बार अब प्रबल आसार बन चुके हैँ।सीमांत भारत चीन व्यापार में लगभग चार सौ से अधिक व्यापारी प्रतिभाग करते हैँ।
नई व्यवस्थाः भारत-चीन व्यापार मार्ग पर घोड़ों की टाप के बजाय गूंजेंगे वाहनों के हॉर्न
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